Upasana Arora

Upasana Arora

Delhi

-

India

- Female
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“Creative Writer”

नज़्म उतरना चाहती है



नज़्म उतरना चाहती है

पर लिखें क्या?

हर बात खुद को दोहराती है

हर लफ्ज़ वही सब कहता है

कि अब भी वक़्त वहीं ठहरा है

वही पल अब तक बीत रहा है

कुछ छम छम करता है अब भी

कुछ साँसें उखड़ी उखड़ी सी हैं

नज़्म वही सब कहती है

जो हर बार ही कहती रहती है

हर अंदाज़ बयान कर चुकी है ये

हर मौसम को जी चुकी है ये

वो एहसास जो छलके थे पहली बार

वो फिर से छलकते हैं अब भी

जब आँख फिर से नम होती है

जब याद दिलों को डुबोती है

जब मौसम लौट के आता है

तब नज़्म उतरना चाहती है

पर सोच में हूँ

कि जो सब कह चुके

सफहों पे कल के

वो सब अब दोहरायें क्या

पर नज़्म उतरना चाहती है

पर लिखें क्या?

चलो पलटते हैं लम्हें

जब ठहरा वक़्त दोहरा खुद को दोहरा सकता है

तो हम भी क्यूँ ना ऐसा कर लें

जो कल अब तक जी रहे हैं

उसको जीते जीते फिर से जी लें

ना पल बीते ना आए कल ना आज रहे ही

लेकिन फिर भी कल को याद करें

और जी लें आज में कल को जो आया ही नही

तुम अब भी मेरे साथ चलो और बात करो

लेकिन हो कोई साथ नहीं और बात नहीं

और जो महसूस किया था थामे हाथ

वो नज़्म कहे और ये भी कहे कि

क्या लगता है जब है

हाथों में हाथ नही

क्या लिखें और क्या ना लिखें

सोच में हूँ की लिखें क्या

नज़्म उतरना चाहती है

पर लिखें क्या.......