
हलक़ को जिसने दबोच के रखा है अंदर
जी चाहता है उसी की गिरेबान पकड़ के
खेंच ले आऊँ बाहर और दे पटकूँ ज़मीन पे
कब से जान फडक रही है जिस्म के अंदर
ज़रा फ़िज़ा में उड़ा दूँ तो इससे भी चैन मिले
जी चाहता है उसी की गिरेबान पकड़ के
खेंच ले आऊँ बाहर और दे पटकूँ ज़मीन पे
कब से जान फडक रही है जिस्म के अंदर
ज़रा फ़िज़ा में उड़ा दूँ तो इससे भी चैन मिले
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