
खामोशी तीन तरह की होती है.
एक वो जिसमें होने वाली
बातों का तक़ाज़ा होता है.
जैसे दूर से एहसास हो जाता है
पटरी पे कान रखने से,
कि रेल गाड़ी आने वाली है.
और एक वो जिसमें,
हो चुकी बातें गूँजती रहती हैं.
जैसे जागके ऊंघती सहेर के कानों में,
रात का गुम्मा गूँजता है.
लेकिन हो चुकी और होने वाली बातों के
बीच की भी एक खामोशी पल ती है!
कभी सिफ़र सी लगती है.. और कभी सफ़र.....
एक वो जिसमें होने वाली
बातों का तक़ाज़ा होता है.
जैसे दूर से एहसास हो जाता है
पटरी पे कान रखने से,
कि रेल गाड़ी आने वाली है.
और एक वो जिसमें,
हो चुकी बातें गूँजती रहती हैं.
जैसे जागके ऊंघती सहेर के कानों में,
रात का गुम्मा गूँजता है.
लेकिन हो चुकी और होने वाली बातों के
बीच की भी एक खामोशी पल ती है!
कभी सिफ़र सी लगती है.. और कभी सफ़र.....
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