ज़ख्म भी अजीब होते हैं... नामुराद भर जाते हैं... कोई जाए तो भी कोई आये तो भी कोई न आये तो भी वक़्त के पल्ले ये कुछ यूँ बंधे हैं कि वो चलता है और ये भरते हैं बस कोई खिलौना हाथ में दे दो तो ... Lire la suite
मैंने बहुत मुशक्कत की लेकिन मुझसे कुछ न हुआ खींचा पटका दीवार पर दे मारा इसको फिर भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ा... ढीठ है शायद.. इसके जैसे से इसको कई बार भिड़ा दिया मैंने कुछ देर भभका फिर वापिस वैसा ... Lire la suite
फ़क़त जमघट ही है.. कुछ मुख़्तसर से ख्यालों का आईने में भाप बना कर लिखे कुछ लफ़्ज़ों सा कलम घिसने का तक़ल्लुफ़ कौन करता है आजकल ठक ठक ठक सब टाइप कर डालते हैं ख़याल नज्मों का उन्वान आजकल mailbox ... Lire la suite
नज़्म एक लम्हा है.... वक़्त के गाल पर ना गाह बोसे जैसा हाथ धोने के बाद बची हुई छींटें किसी के चेहरे पे मारने जैसा है नज़्म एक लम्हा है गलती करके कोई छोटी सी जीभ बाहर करके आंखें भींचे ... Lire la suite
सोने दो न कुछ और देर मुझे सीने पे सर यूँ ही रहने दो न और कंधे पर से हाथ न हटाओ बस यूँ ही ऐसे ही रहने दो न रहने दो जी.... दो उंगलियाँ थक जायेंगी इनको मुझपे यूँ ... Lire la suite
मुकदी मुकदी उमरां मुक गई मुकदे मुकदे सा नई मुकदे होली होली रातां वी कट गई होली होली हंजू नई सुखदे देस पियारे लोकां ते वारे जोग रमा के चल पए हाँ इश्के दी छत जदों दी आई सुख दुःख ... Lire la suite
सुनो.. तुम कुछ सुनना मत… जब भी अपनी तन्हाइयों में मैं तुम्हें याद करके जो कहूं तुम्हारे कानों में वो तुम बिल्कुल भी मत सुनना ये भी न सुनना कि तुम्हारी नज़र से जो मुझपर पड़ती है और जिस तरह ... Lire la suite
कोई कहे मोहे का से कहूं मैं...... मन् जब होवे धीर अधीर..... हूँ हूँ मारे सांस न आवे पी की बाट में होई अधीर कैसे कहूं मैं तोसे मोरे प्रीतम आन मिलो मैं तो होयी अधीर हमरी बैथा तुमरी भी ... Lire la suite